पूर्वोत्तर
भारत के हिंदी कलमकारों का दायित्व
डा.गोमा देवी
शार्मा
मणिपुर
साहित्य मनुष्य के भाव एवं
विचारों की अभिव्यक्ति का एक प्रमुख एवं प्रबल माध्यम है। किसी भी समाज की पहचान,
उसके पास उपलब्ध उन्नत साहित्य से संभव है। साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है।
साहित्यकार समाज में स्थापित मूल्यों, परंपराओं, सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक,
आर्थिक परिस्थितियों को अपनी लेखनी से अभिव्यक्ति देता है। उसका यह कार्य सदियों
तक समाज को प्रतिबिंबित करता है। लेखक सदैव समाज का पक्षधर होता है। उसकी लेखनी
समाज, संस्कृति और देशों को जोड़ती है, जिसमें काल, भूगोल, संस्कृति की बाधा नहीं
होती।
किसी भी राष्ट्र के निर्माण और
उसके उत्थान में अन्य कारकों की तरह उसका साहित्य भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता
है। किसी देश को उत्कृष्ट और यथार्थ साहित्य देने का दायित्व भी उसके साहित्यकार
का होता है। विविध जाति, विविध संस्कृति, परंपरा, भाषा से युक्त देश के हरेक
प्रांतों को अपनी लेखनी से जोड़कर देश की अखंडता को मजबूती प्रदान करने के प्रति
भी साहित्यकारों का महत दायित्व बनता है।
भारत के गौरवशाली अतीत का परिचय
देने में सहित्य की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। संस्कृत की उच्च परंपरा, मध्यकाल
की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था का परिचय इतिहास से कहीं ज्यादा
साहित्य ने दिया है। प्रेमचंद ने भारतीय समाज के जिस यथार्थ रूप का परिचय अपनी
लेखनी के माध्यम से दिया है उसके लिए भारत का इतिहास प्रेमचंद का सदैव ऋणि रहेगा।
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र
विविधताओं का आगार है। भाषिक पृथकता के कारण लंबे समय तक यह राष्ट्र की प्रमुख
धारा से कटकर रहने को मजबुर रहा। यहाँ की बोलियाँ, भाषा, संस्कृति, जाति-उपजाति,
पर्व, उत्सव, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व्यवस्था, अराजकता, समस्याएँ आदि आज के
हिंदी कलमकारों की लेखनी का केंद्र बनने की माँग करते हैं। भारत की स्वाधीनता
प्राप्ति से पहले ही इन प्रांतों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम शुरु हुआ था
पर यथेष्ट मात्रा में पूर्वोत्तर आधारित हिंदी साहित्य का निर्माण अभी तक नहीं हुआ
है।
पूर्वोत्तर राज्य प्रचुर संसाधन एवं अलौकिक प्राकृतिक वैभव की
अनूठी छटा से लबरेज हैं। वर्तमान में पूर्वोत्तर भारत में आठ राज्य शामिल हैं - अरुणाचल
प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम। इन आठ राज्यों के विकास के लिए सन् १९७१
में केन्द्रीय संस्था के रूप में पूर्वोत्तर परिषद के गठन के बाद से भारत सरकार ने
इस क्षेत्र में हिंदी की प्रगति के लिए प्रभावी योजना बनाना आरम्भ किया।
पूर्वोत्तर भारत में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति प्रेम में अप्रत्याशित रूप से
वृद्धि हुई है। इन राज्यों में सेना, सुरक्षा से
जुड़े हुए जवान, व्यापार के लिए हिन्दी भाषी क्षेत्रों से
जाकर बस जाने वाले व्यापारी, पूर्वी उत्तर
प्रदेश और बिहार से काम के सिलसिले में इन राज्यों में आए मजदूरों के कारण यहाँ
हिंदी भाषा के प्रसार की शुरुआत को नकारा नहीं जा सकता। आजादी के बाद स्कूल, कॉलेज
तथा विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन की व्यवस्था से इन प्रांतों में हिंदी
मोह का भाव विकसित हुआ है।
वर्तमान में सूचना और प्रौद्योगिकी के विकास के कारण पूर्वोत्तर
भारत में हिंदी समझने एवं जानने वाले तथा बोलने वाले लोगों की संख्या पर्याप्त है। हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता, हिंदी
समाचार चैनलों की व्यापकता, हिंदी टेलिविजन के धारावाहिक आदि से इन राज्यों में हिंदी का प्रचार-प्रसार खूब हुआ है।
समय -समय पर यहाँ हिंदी के मनिषियों ने इसके प्रचार-प्रसार के लिए जो प्रयत्न किए
हैं, उनके योगदान को बी नहीं भूलना चाहिए। असम के गोपीनाथ बरदलै, मणिपुर के ललित
माधव शर्मा, एस. नीलवीर शास्त्री, राधा गोविंद थोङाम आदि, मिजोरम में डॉ. जेनी, त्रिपुरा
के रमेश पाल, आदि को हिंदी के प्रारंभिक प्रचार-प्रसार का श्रेय जाता है। यहाँ से
चयोलपाउ, यूमसकैशा, सेंटिनल, दैनिक पूर्वोदय, प्रात: खबर, चाणक्य वार्ता, समन्वय पूर्वोत्तर जैसी
पत्र-पत्रिकाएँ निकलती ही नहीं बल्कि इनके पाठकों की संख्या भी बडी तादाद में हैं।
मणिपुर हिंदी परिषद, मणिपुर
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, नागालैण्ड
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,‘मिज़ोरम हिंदी प्रचार सभा, आइजोल, केंद्रीय हिंदी संस्थान केंद्र गुवाहाटी, शिलांग,
पूर्वोत्तर हिंदी साहित्य अकादमी तथा इन राज्यों में स्थित महाविद्यालय एवं विश्विद्यालय जैसी
संस्थाएँ अनवरत हिंदी के प्रचार-प्रसार में अहर्निश कार्यरत हैं। इतना होने के
बावजूद भी हिंदी साहित्य में पूर्वोत्तर भारत की अनुगूँज यथेष्ट मात्रा में प्रतिध्वनित
नहीं हो रही है, यह दुखद बात है।
पूर्वोत्तर भारत के हिंदी रचनाकारों का दायित्व
पूर्वोत्तर भारत केंद्रित जनजीवन को
अभिव्यक्त करने वाले साहित्य के समुचित विकास के बिना समग्र हिंदी साहित्य पूर्ण
नहीं माना जा सकता। यहाँ की मिट्टी ने कर्मठ और एक-एक बलिदानी सपूतों को जन्म दिया
है। इसकी मिट्टी का हरेक कण शहीदों के रक्त से रंजित है। उनकी शौर्य गाथा का
समुचित सम्मान करते हुए उनको हिंदी वाङमय की दुनिया में स्थान दिलाने का महत कार्य
पूर्वोत्तर में सक्रिय हिंदी के साहित्यकारों का कर्मक्षेत्र बनना चाहिए। सूदूर मणिपुर
में स्थित लोकताक झील के सौंदर्य की आभा का प्रतिबिंब हिंदी साहित्य के दर्पण में
प्रतिबिंबित करने का बीड़ा इन हिंदी साहित्यकारों को उठाना होगा। खाङ्खुई
की रहस्यमयी गूफा, कौब्रू पहाड़ का सौंदर्य, यहाँ के पहाड़ों में नित कर्मठता का संदेश देती हुई, मुँह
अंधेरे बागानों में जाकर सब्जी-फल तोड़कर उन्हें टोकरी में भरकर बेचने के लिए
मीलों पैदल तय करके जीविकोपार्जन करने वाली नागा महिलाएँ, बड़े-बड़े बाजारों का
संचालन करने वाली मणिपुरी महिलाएँ, पारंपरिक खेल, पहाड़ों में श्वेत क्रांति लाने
वाली गोर्खा जाति की इमान्दारी की गाथा को वाणी देने का कार्य पूर्वोत्तर में
सक्रिय हिंदी रचनाकारों का दायित्व है।
प्याज के परतों के समान पर्वत मालाओं की हार पहने नागालैंड का प्राकृतिक
सौंदर्य, एक जाति होते
हुए भी हरेक गाँव में अलग-अलग भाषा बोलने वाली यहाँ की नागा जाति, उनकी लोक कथाएँ,
लोक गीत, लोक गाथाएँ, उनका रहन-सहन, उनकी संस्कृति, उनकी राष्ट्रीयता के भाव को
वाणी देने का कार्य कौन करेगा? नागा जाति या हिंदी के रचनाकार?
मेघालय की विविध
जनजातियाँ हिंदी साहित्य का विषयवस्तु बनने की माँग कर रही हैं। यहाँ की मूल
निवासी खासी जाति की मातृ-सत्तमात्मक सामाजिक ढाँचे से शायद ही शेष भारत परिचित
हो। हिंदी साहित्य में पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था के बारे में पढ़-पढकर ऊबे हुए
पाठकों की मानस के भूख की तृप्ति के लिए एक अनूठा खुराक अवश्य प्राप्त होगा। इस
समाज में पुरुष नारी को नहीं बल्कि नारी पुरुष को विवाह करके अपने घर लाती है और
उनसे पैदा हुई संतानों को माँ की पहचान मिलती है। भारत के इस प्रांत की इस अनूठी
सामाजिक व्यवस्था को वाणी देने की जरूरत है। जो भारतीय समाज पितृ-सत्ता को महत्व
देता है, नारी को सिर्फ बच्चा जनने का साधन मानता है, समाज में पुरुषों से हेय
मानता है, नारी के मानवाधिकार कुचलने पर अपनी शान समझता है, वह भी तो जान लें कि
खासी जनजाति भारत की ही हिस्सा है। इस जाति की सामाजिक व्यवस्था शेष भारत को नारी
सम्मान का पाठ सिखाने का साधन बन सकती है। माओसिनरम, चेरापूंजी जैसे
स्थलों का प्राकृतिक सौंदर्य, लोक साहित्य आदि को हिंदी साहित्य में स्थान देने का
काम हिंदी रचनाकारों का काम है।

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